(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर विशेष)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल 2 मई को बर्लिन में भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘मैं देश का पहला प्रधानमंत्री ऐसा हूं जो आजाद हिंदुस्तान में पैदा हुआ हूं. विदेशी हुकूमत ने भारतीयों का जो आत्मविश्वास साल-दर-साल कुचला था, उसकी भरपाई का एक ही उपाय है, फिर से एक बार भारत के जन-जन में आत्मविश्वास भरना और आत्मगौरव भरना.’ 140 करोड़ भारतीयों में यही आत्मगौरव भरने के लिए मोदी और उनकी सरकार लगातार कोशिशों में जुटी है.

प्रधानमंत्री मोदी का संकल्प है कि आज़ादी के इस अमृत काल में हर भारतवासी आत्मविश्वास और आत्मगौरव से लबरेज हो और गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह आज़ाद हो. वो अक्सर औपनिवेशिक विरासतों और गुलामी के प्रतीकों को भारतीय परंपराओं और विचारों से बदलने की बात करते हैं. अभी पिछले महीने ही 15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को पंच प्रण का सिद्धांत दिया था, इसमें एक प्रण हर देशवासी को अपनी सोच और आदतों से गुलामी के अंश को पूरी तरह खत्म करने का अटल इरादा है.

इस ‘अमृत लक्ष्य’ को पूरा करने के लिए मोदी पिछले 8 वर्षों से सतत प्रयासरत हैं. 17 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी का जन्मदिन है. अपने जन्मदिन से ठीक 9 दिन पहले यानि 8 सितंबर को उन्होंने विदेशी हुकूमत की याद दिलाने वाली गुलामी की एक और निशानी को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

राजपथ नहीं, कर्तव्य पथ कहिए

पहले किंग्सवे और फिर राजपथ के नाम से जानी जाने वाली लुटियंस वाली दिल्ली की ऐतिहासिक सड़क का नाम अब कर्तव्य पथ हो गया है. गुरुवार को पीएम मोदी ने इसका उद्घाटन किया. यहां एक बार फिर उन्होंने गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति का प्रण दोहराया, कहा, ‘गुलामी का प्रतीक किंग्सवे यानि राजपथ, आज से इतिहास की बात हो गया है, हमेशा के लिए मिट गया है. आज कर्तव्य पथ के रूप में नया इतिहास बना है.’

ग्रैंड कैनोपी में नेताजी की प्रतिमा

कर्तव्य पथ के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने इंडिया गेट की ग्रैंड कैनोपी में आज़ादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा का भी अनावरण किया. इसी साल 23 जनवरी को नेताजी की जयंती पर यहां उनकी होलोग्राफिक प्रतिमा लगाई गई थी, जिसे अब एक पत्थर से बनी स्थायी मूर्ति में बदल दिया गया है. ये वही ग्रैंड कैनोपी है, जहां 1960 के दशक तक ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि जार्ज पंचम की मूर्ति लगी हुई थी. अब उसी जगह पर नेताजी की प्रतिमा का अनावरण कर पीएम मोदी ने आधुनिक और सशक्त भारत की प्राण प्रतिष्ठा कर दी है.

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का बदला नाम

अखंड भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर पहचाने जाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1947 से पहले ही अंडमान को आज़ाद कराकर वहां तिरंगा फहराया था. बावजूद इसके, हाल के वर्षों तक अंडमान-निकोबार के वो द्वीप गुलामी की निशानियों को ढोने के लिए मजबूर थे. जबकि, 1943 में ही नेताजी ने अंडमान को शहीद और निकोबार को स्वराज द्वीप का नाम दिए जाने का सुझाव दिया था. लेकिन, आज़ादी के सात दशक बाद तक ना तो नेताजी के सुझावों का मान रखा गया और ना ही द्वीपों के नाम बदले गए थे. उन द्वीपों के नाम अंग्रेज शासकों के नाम पर ही थे. लेकिन, 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने गुलामी की उन निशानियों को मिटाकर नेताजी की इच्छाओं के मुताबिक ही उनके दिए नाम से जोड़ा और भारतीय नाम दिए, भारतीय पहचान दी.

2018 में पीएम मोदी की पहल पर ही रॉस द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील द्वीप का नाम शहीद द्वीप और हेवलॉक द्वीप का नाम स्वराज द्वीप किया गया.

नौसेना का नया निशान

गुलामी के प्रतीकों से आज़ादी का सिलसिला 2014 से चल रहा है, लेकिन इस साल किल किले से पीएम मोदी के ऐलान के बाद इसे और गति मिली है. इसी महीने 2 सितंबर को INS विक्रांत के जलावतरण के साथ ही नौसेना के झंडे से गुलामी के निशान को भी हटा दिया गया. झंडे में सेंट जार्ज क्रॉस की जगह छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मुहर को जगह दी गई है. झंडे में ऊपर की तरफ बाई ओर हिंदुस्तान की आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रध्वज तिरंगा है. दाहिनी ओर एक अष्टकोण में सुनहरे रंग का प्रतीक अशोक चिह्न बना है, और नीचे लिखा है ‘शं नो वरुण:’ संस्कृत में लिखे इस श्लोक का अर्थ है ‘जल के देवता वरुण हमारे लिए शुभ हों’. आज़ाद भारत की नौसेना का ये नया ध्वज गुलामी के प्रतीक से मुक्ति और विरासत पर गर्व का सुनहरा अध्याय है.

रेस कोर्स रोड अब लोक कल्याण मार्ग

प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही औपनिवेशिक काल के प्रतीकों को खत्म करने का ऐलान 15 अगस्त को किया, लेकिन इस दिशा में उनका प्रयास पहले से ही चल रहे हैं. वर्ष 2016 तक देश के प्रधानमंत्री का आवास रेस कोर्स रोड के नाम से जाना जाता था. ये नाम अंग्रेजों का रखा हुआ था. पीएम मोदी ने इसे बदलकर लोक कल्याण मार्ग किया. जिसके बाद से प्रधानमंत्री आवास का पता 7 लोक कल्याण मार्ग के नाम से जाना जाता है.

सड़कों से गुलामी के निशान हटाए

मुगलों और अंग्रेजों की राजधानी रह चुकी दिल्ली में अब भी कई नाम और निशान थे, जो गुलामी की त्रासदी की यादों को ताजा कर देते थे. लेकिन पीएम मोदी ने 2014 के बाद उन्हें खत्म करने की शुरुआत की. क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब के नाम की सड़क को 2015 में बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया. इसी तरह 2017 में डलहौजी रोड को दारा शिकोह रोड का नाम दिया गया. हाइफा युद्ध के नायकों को सम्मान देने के लिए 2018 में तीन मूर्ति चौक के नाम में हाइफा जोड़ा गया, अब ये चौक तीन मूर्ति हाइफा चौक के नाम से जाना जाता है.

बीटिंग द रिट्रीट में बदलाव

आज़ाद भारत में सात दशक बाद भी गणतंत्र दिवस समारोह के समापन ‘बीटिंग द रिट्रीट’ में भारतीय सेनाओं के बैंड ‘अबाइड विद मी’ धुन बजाते आ रहे थे. स्कॉटिश कवि हेनरी फ्रांसिस लिटे की 1847 में लिखी ये धुन ना सिर्फ उदासी भरी धुन थी बल्कि इसे दुख या मातम के समय ही बजाया जाता था. इसी साल 29 जनवरी को मोदी सरकार ने इस धुन की जगह कवि प्रदीप के लिखे गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को बीटिंग द रिट्रीट में शामिल किया. इससे पहले 2015 में बीटिंग द रिट्रीट में भारतीय म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स सितार, संतूर और तबला को पहली बार शामिल कर समारोह में भारतीय रंग और धुन भरे गए.

पहला राष्ट्रीय युद्ध स्मारक

कहते हैं किसी भी राष्ट्र को अपने युद्ध वीरों को नहीं भूलना चाहिए. लेकिन लंबे वक्त तक भारत के पास शहीद सैनिकों की याद में कोई स्मारक नहीं था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कमी को भी खत्म किया और इंडिया गेट पास ही राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के तौर पर वीर योद्धाओं की थाती को सहेजा. अखंड ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की ज्योति में शामिल कर गर्व की लौ को सशक्त किया है.

रेल बजट का आम बजट में विलय

औपनिवेशिक काल से चली आ रही अलग-अलग रेल बजट और आम बजट की प्रक्रिया भी प्रधानमंत्री मोदी ने ही खत्म की. 92 साल पुरानी परंपरा को खत्म कर मोदी सरकार ने 2017 में पहली बार आम बजट में ही रेल बजट को जोड़ा और बजट पेश करने की तारीख भी बदलकर 1 फरवरी कर दी.

अंग्रेजों के जमाने के कानूनों से मुक्ति

सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने 1500 से भी ज्यादा पुराने और निष्प्रभावी कानूनों को खत्म कर दिया है. इनमें कई कानून ब्रिटिश राज के दौरान सिर्फ आम भारतीयों पर जुल्म ढाने के लिए बनाए गए थे.

गुलामी से मुक्त होने से ज्यादा मुश्किल लेकिन सबसे जरूरी है गुलामी की सोच और निशानी से मुक्त हो पाना. इन प्रतीकों से मुक्ति की दिशा में ये बदलाव प्रतीकात्मक ही सही लेकिन बेहद अहम हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक ऐसे दर्जनों प्रतीकों और चिह्नों को बदलकर 140 करोड़ हिन्दुस्तानियों के दिलों में इस बात की उम्मीद जगा दी है कि आने वाले वर्षों में देश गुलामी की सोच और प्रतीकों से पूरी तरह मुक्ति पा लेगा.

(डिसक्लेमर : लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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